राणा विश्वकर्मा सेवा समिति

राणा विश्वकर्मा सेवा समिति में हार्दिक अभिनन्दन है। विश्वकर्मा एवं राणा समाज के उत्थान एवं विकास में बहुत सारे प्रयास किया जा रहा है। अलग अलग राज्यों में अलग अलग संस्था के द्वारा अनेकों प्रयास के कार्य किये जा रहे है। उसी कडी के साथ जुडते हुवे हमारे संस्था के द्वारा भी एक छोटा सा प्रयास किया जा रहा है की झारखण्ड के राणा एवं विश्वकर्मा समाज के जो भी भाई बंधु अपने राज्य से बाहर अपने रोजी रोजगार के लिए आये हैं,

उनको एक छत नीचे अपने विचार या अपने सुख दुःख रखने का मौका मिले । राणा विश्वकर्मा सेवा समिति ,मुम्बई जो मुम्बई में कार्य कर रही है एवं नवयुवक राणा विश्वकर्मा सेवा समिति झारखण्ड जो झारखण्ड में अपने सेवा में ततपर है। आप हमारे किसी भी संस्था से जुड़ कर अपने आने वाले समय में किसी भी प्रकार जो संस्था के माध्यम से लाभ होगा उसका लाभ ले सकते है। हमारे संस्था के द्वारा आधुनिक टेक्नोलॉजी के साथ समाज को जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।आने वाले समय में इसके द्वारा आप सभी को काफी लाभ मिल सकता है आप चाहे झारखण्ड के संस्था का सदस्य हो या मुम्बई के सदस्य हो आपको दोनों जगह पर समान अधिकार मिलेगा। आपको हमारी संस्था का लाभ लेने के लिए रजिस्ट्रेशन फॉर्म में अपनी सभी जानकारी सही सही भरना है। विशेष जानकारी आपको हमारे संस्था से जुडने के उपरांत दिया जायेगा। हमारी संस्था महाराष्ट्र सरकार के द्वारा नामांकित है, एवं सम्पूर्ण भारत मे कार्य करने के लिए अधिकृत है, और पूरी तरह लीगल है । फिलहाल संस्था मुम्बई एवं झारखण्ड में अपना कार्य सुचारू रूप से कर रही है।

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श्री विश्वकर्मा भगवान से जुडी कुछ बातें

हम अपने प्राचीन ग्रंथो उपनिषद एवं पुराण आदि का अवलोकन करें तो पायेगें कि आदि काल से ही विश्वकर्मा शिल्पी अपने विशिष्ट ज्ञान एवं विज्ञान के कारण ही न मात्र मानवों अपितु देवगणों द्वारा भी पूजित और वंदित है । भगवान विश्वकर्मा के आविष्कार एवं निर्माण कोर्यों के सन्दर्भ में इन्द्रपुरी, यमपुरी, वरुणपुरी, कुबेरपुरी, पाण्डवपुरी, सुदामापुरी, शिवमण्डलपुरी आदि का निर्माण इनके द्वारा किया गया है । पुष्पक विमान का निर्माण तथा सभी देवों के भवन और उनके दैनिक उपयोगी होनेवाले वस्तुएं भी इनके द्वारा ही बनाया गया है । कर्ण का कुण्डल, विष्णु भगवान का सुदर्शन चक्र, शंकर भगवान का त्रिशुल और यमराज का कालदण्ड इत्यादि वस्तुओं का निर्माण भगवान विश्वकर्मा ने ही किया है । 

भगवान विश्वकर्मा ने ब्रम्हाजी की उत्पत्ति करके उन्हे प्राणीमात्र का सृजन करने का वरदान दिया और उनके द्वारा 84 लाख योनियों को उत्पन्न किया । श्री विष्णु भगवान की उत्पत्ति कर उन्हे जगत में उत्पन्न सभी प्राणियों की रक्षा और भगण-पोषण का कार्य सौप दिया । प्रजा का ठीक सुचारु रुप से पालन और हुकुमत करने के लिये एक अत्यंत शक्तिशाली तिव्रगामी सुदर्शन चक्र प्रदान किया । बाद में संसार के प्रलय के लिये एक अत्यंत दयालु बाबा भोलेनाथ श्री शंकर भगवान की उत्पत्ति की । उन्हे डमरु, कमण्डल, त्रिशुल आदि प्रदान कर उनके ललाट पर प्रलयकारी तिसरा नेत्र भी प्रदान कर उन्हे प्रलय की शक्ति देकर शक्तिशाली बनाया । यथानुसार इनके साथ इनकी देवियां खजाने की अधिपति माँ लक्ष्मी, राग-रागिनी वाली वीणावादिनी माँ सरस्वती और माँ गौरी को देकर देंवों को सुशोभित किया ।

श्री विश्वकर्मा भगवान

हिन्दू धर्म में विश्वकर्मा को निर्माण एवं सृजन का देवता माना जाता है।

ऋग्वेद मे विश्वकर्मा सुक्त के नाम से 11 ऋचाऐ लिखी हुई है। जिनके प्रत्येक मन्त्र पर लिखा है ऋषि विश्वकर्मा भौवन देवता आदि। यही सुक्त यजुर्वेद अध्याय 17, सुक्त मन्त्र 16 से 31 तक 16 मन्त्रो मे आया है ऋग्वेद मे विश्वकर्मा शब्द का एक बार इन्द्र व सुर्य का विशेषण बनकर भी प्रयुक्त हुआ है। परवर्ती वेदों मे भी विशेषण रूप मे इसके प्रयोग अज्ञत नही है यह प्रजापति का भी विशेषण बन कर आया है।

हमारे धर्मशास्त्रो और ग्रथों में विश्वकर्मा के पाँच स्वरुपों और अवतारों का वर्णन प्राप्त होता है ।

  • विराट विश्वकर्मा – सृष्टि के रचेता
  • धर्मवंशी विश्वकर्मा – महान शिल्प विज्ञान विधाता प्रभात पुत्र
  • अंगिरावंशी विश्वकर्मा – आदि विज्ञान विधाता वसु पुत्र
  • सुधन्वा विश्वकर्म – महान शिल्पाचार्य विज्ञान जन्मदाता ऋशि अथवी के पात्र
  • भृंगुवंशी विश्वकर्मा – उत्कृष्ट शिल्प विज्ञानाचार्य (शुक्राचार्य के पौत्र )

श्री विश्वकर्मा भगवान के अवतार

श्री विश्वकर्मा वंशावली जैसे राम् कृष्णा आदि ईश्वर के अनेक अवतार पुराणों में वर्णन किये गये है, वैसे ही विश्वकर्मा भगवान के अवतारों का वर्णन मिलता है। स्कन्द पुराण के काशी खंड में महादेव जी ने पार्वती जी से कहा है कि हे पार्वती मैं आप से पाप नाशक कथा कहता हूं। इसी कथा में महादेव जी ने पार्वती जी को विश्वकर्मेश्वर लिगं प्रकट होने की कथा कहते हुए त्वष्टा प्रजापति के पुत्र के संबंध में कहाः

प्रथम अवतार
विश्वकर्माSभवत्पूर्व ब्रह्मण स्त्वपराSतनुः। त्वष्ट्रः प्रजापतेः पुत्रो निपुणः सर्व कर्मस।।
अर्थः प्रत्यक्ष आदि ब्रह्मा विश्वकर्मा त्वष्टा प्रजापति का पुत्र पहले उत्पन्न हुआ और वह सब कामों मे निपुण था।
दूसरा अवतार
स्कन्द पुराण प्रभास खंड सोमनाथ माहात्म्य सोम पुत्र संवाद में विश्वकर्मा के दूसरे अवतार का वर्णन इस भातिं मिलता है। ईश्वर उचावः शिल्पोत्पत्तिं प्रवक्ष्यामि श्रृणु षण्मुख यत्नतः। विश्वकर्माSभवत्पूर्व शिल्पिनां शिव कर्मणाम्।। मदंगेषु च सभूंताः पुत्रा पंच जटाधराः। हस्त कौशल संपूर्णाः पंच ब्रह्मरताः सदा।।
एक समय कैलाश पर्वत पर शिवजी, पार्वती, गणपति आदि सब बैठे थे उस समय स्कन्दजी ने गणपतिजी के रत्नजडित दातों और पार्वती जी के जवाहरात से जडें हुए जेवरों को देखकर प्रश्न किया कि, हे पार्वतीनाथ, आप यह बताने की कृपा करे कि ये हीरे जवाहरात चमकिले पदार्थो किसने निर्मित किये? इसके उत्तर में भोलानाथ शंकर ने कहा कि शिल्पियों के अधिपति श्री विश्वकर्मा की उत्पति सुनो। शिल्प के प्रवर्त्तक विश्वकर्मा पांच मुखों से पांच जटाधरी पुत्र उत्पन्न हुए जिन के नाम मनु, मय, शिल्प, त्वष्टा, दैवेज्ञ थे। यह पांचों पुत्र ब्रह्मा की उपासना में सदा लगें रहतें थे इत्यादि।
तीसरा अवतार
आर्दव वसु प्रभास नामक को अंगिरा की पुत्री बृहस्पति जी की बहिन योगसिद्ध विवाही गई और अष्टम वसु प्रभाव से जो पुत्र उत्पन्न हुआ उसका नाम विश्वकर्मा हुआ जो शिल्प प्रजापति कहलाया इसका वर्णन वायुपुराण अ.22 उत्तर भाग में दिया हैः बृहस्पतेस्तु भगिनो वरस्त्री ब्रह्मचारिणी। योगसिद्धा जगत्कृत्स्नमसक्ता चरते सदा।। प्रभासस्य तु सा भार्या वसु नामष्ट मस्य तु। विश्वकर्मा सुत स्तस्यां जातः शिल्प प्रजापतिः।।
मत्स्य पुराण अ.5 में भी लिखा हैः विश्वकर्मा प्रभासस्य पुत्रः शिल्प प्रजापतिः। प्रसाद भवनोद्यान प्रतिमा भूषणादिषु। तडागा राम कूप्रेषु स्मृतः सोमSवर्धकी।।
अर्थः प्रभास का पुत्र शिल्प प्रजापति विश्वकर्मा देव, मन्दिर, भवन, देवमूर्ति, जेवर, तालाब, बावडी और कुएं निर्माण करने देव आचार्य थे। आदित्य पुराण में भी कहा है किः विश्वकर्मा प्रभासस्य धर्मस्थः पातु स ततः।।
महाभारत आदि पर्व विष्णु पुराण औरं भागवत में भी इसका उल्लेख किया गया है।

विश्वकर्मा जयंती

विश्वकर्मा जयंती हिंदू धर्म में ब्रह्मांड के दिव्य वास्तुकार भगवान विश्वकर्मा को समर्पित है। विश्वकर्मा भाद्र केबंगाली महीने के अंतिम दिन, विशेष रूप से भद्रा संक्रांति पर निर्धारित की जाती है। यही कारण है कि जब सूर्य सिंह सेकन्या पर हस्ताक्षर करता है इसे कन्या सक्रांति के रूप में भी जाना जाता है।

विश्‍वकर्मा पूजा का महत्‍व
भगवान विश्वकर्मा के जन्मदिन को विश्वकर्मा पूजा, विश्वकर्मा दिवस या विश्वकर्मा जयंती के रूप में जाना जाता है। हिंदू धर्म में इस त्योहार का विशेष महत्व है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन भगवान विश्वकर्मा का जन्म ब्रह्मांड के रचयिता ब्रह्मा के सातवें धर्मपुत्र के रूप में हुआ था। भगवान विश्वकर्मा को ‘देवताओं का वास्तुकार’, ‘वास्तुशास्त्र का देवता’, ‘प्रथम इंजीनियर’, ‘देवताओं का अभियंता’ और ‘मशीन का देवता’ कहा जाता है। विष्णु पुराण में, विश्वकर्मा को ‘देव करवानी’ कहा गया है। यही कारण है कि हिंदू समाज में विश्वकर्मा पूजा का विशेष महत्व है। क्यों नहीं? यदि मनुष्य के पास शिल्प ज्ञान नहीं है तो वह निर्माण कार्य नहीं कर पाएगा। यदि निर्माण नहीं होगा तो इमारतें और भवन नहीं बनेंगे, जो मानव सभ्यता के विकास को रोकेंगे। अगर मशीनें और उपकरण नहीं होंगे तो दुनिया विकसित नहीं हो पाएगी। यह कहना कि सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विकास के लिए शिल्प ज्ञान होना बहुत जरूरी है। यदि शिल्प ज्ञान आवश्यक है तो शिल्प के देवता विश्वकर्मा की पूजा का महत्व भी बढ़ जाता है। ऐसा माना जाता है कि विश्वकर्मा की पूजा करने के बाद, दिन-रात व्यापार में चौगुनी वृद्धि होती है।

श्री विश्वकर्मा चालीसा

श्री विश्वकर्म प्रभु वन्दऊँ, चरणकमल धरिध्य़ान।
श्री, शुभ, बल अरु शिल्पगुण, दीजै दया निधान।।

जय श्री विश्वकर्म भगवाना। जय विश्वेश्वर कृपा निधाना।।
शिल्पाचार्य परम उपकारी। भुवना-पुत्र नाम छविकारी।।
अष्टमबसु प्रभास-सुत नागर। शिल्पज्ञान जग कियउ उजागर।।
अद्रभुत सकल सुष्टि के कर्त्ता। सत्य ज्ञान श्रुति जग हित धर्त्ता।।
अतुल तेज तुम्हतो जग माहीं। कोइ विश्व मँह जानत नाही।।
विश्व सृष्टि-कर्त्ता विश्वेशा। अद्रभुत वरण विराज सुवेशा।।
एकानन पंचानन राजे। द्विभुज चतुर्भुज दशभुज साजे।।
चक्रसुदर्शन धारण कीन्हे। वारि कमण्डल वर कर लीन्हे।।
शिल्पशास्त्र अरु शंख अनूपा। सोहत सूत्र माप अनुरूपा।।
धमुष वाण अरू त्रिशूल सोहे। नौवें हाथ कमल मन मोहे।।
दसवाँ हस्त बरद जग हेतू। अति भव सिंधु माँहि वर सेतू।।
सूरज तेज हरण तुम कियऊ। अस्त्र शस्त्र जिससे निरमयऊ।।
चक्र शक्ति अरू त्रिशूल एका। दण्ड पालकी शस्त्र अनेका।।
विष्णुहिं चक्र शुल शंकरहीं। अजहिं शक्ति दण्ड यमराजहीं।।
इंद्रहिं वज्र व वरूणहिं पाशा। तुम सबकी पूरण की आशा।।
भाँति – भाँति के अस्त्र रचाये। सतपथ को प्रभु सदा बचाये।।
अमृत घट के तुम निर्माता। साधु संत भक्तन सुर त्राता।।
लौह काष्ट ताम्र पाषाना। स्वर्ण शिल्प के परम सजाना।।
विद्युत अग्नि पवन भू वारी। इनसे अद् भुत काज सवारी।।
खान पान हित भाजन नाना। भवन विभिषत विविध विधाना।।
विविध व्सत हित यत्रं अपारा। विरचेहु तुम समस्त संसारा।।
द्रव्य सुगंधित सुमन अनेका। विविध महा औषधि सविवेका।।
शंभु विरंचि विष्णु सुरपाला। वरुण कुबेर अग्नि यमकाला।।
तुम्हरे ढिग सब मिलकर गयऊ। करि प्रमाण पुनि अस्तुति ठयऊ।।
भे आतुर प्रभु लखि सुर–शोका। कियउ काज सब भये अशोका।।
अद् भुत रचे यान मनहारी। जल-थल-गगन माँहि-समचारी।।
शिव अरु विश्वकर्म प्रभु माँही। विज्ञान कह अतंर नाही।।
बरनै कौन स्वरुप तुम्हारा। सकल सृष्टि है तव विस्तारा।।
रचेत विश्व हित त्रिविध शरीरा। तुम बिन हरै कौन भव हारी।।
मंगल-मूल भगत भय हारी। शोक रहित त्रैलोक विहारी।।
चारो युग परपात तुम्हारा। अहै प्रसिद्ध विश्व उजियारा।।
ऋद्धि सिद्धि के तुम वर दाता। वर विज्ञान वेद के ज्ञाता।।
मनु मय त्वष्टा शिल्पी तक्षा। सबकी नित करतें हैं रक्षा।।
पंच पुत्र नित जग हित धर्मा। हवै निष्काम करै निज कर्मा।।
प्रभु तुम सम कृपाल नहिं कोई। विपदा हरै जगत मँह जोइ।।
जै जै जै भौवन विश्वकर्मा। करहु कृपा गुरुदेव सुधर्मा।।
इक सौ आठ जाप कर जोई। छीजै विपति महा सुख होई।।
पढाहि जो विश्वकर्म-चालीसा। होय सिद्ध साक्षी गौरीशा।।
विश्व विश्वकर्मा प्रभु मेरे। हो प्रसन्न हम बालक तेरे।।
मैं हूँ सदा उमापति चेरा। सदा करो प्रभु मन मँह डेरा।।
करहु कृपा शंकर सरिस, विश्वकर्मा शिवरुप।
श्री शुभदा रचना सहित, ह्रदय बसहु सुरभुप।।

श्री विश्वकर्मा भगवान की प्रात: कालीन स्तुति

श्री विश्वकर्मा विश्व के भगवान सर्वाधारणम्। शरणागतम् शरणागतम् शरणागतम् सुखाकारणम्।।
कर शंख चक्र गदा मद्दम त्रिशुल दुष्ट संहारणम्। धनुबाण धारे निरखि छवि सुर नाग मुनि जन वारणम्।।
डमरु कमण्डलु पुस्तकम् गज सुन्दरम् प्रभु धारणम्। संसार हित कौशल कला मुख वेद निज उच्चारणम्।।
त्रैताप मेटन हार हे ! कर्तार कष्ट निवारणम्। नमस्तुते जगदीश जगदाधार ईश खरारणम्।।
सर्वज्ञ व्यापक सत्तचित आनंद सिरजनहारणम्। सब करहिं स्तुति शेष शारदा पाहिनाथ पुकारणम्।।
श्री विश्वपति भगवत के जो चरण चित लव लांइ है। करि विनय बहु विधि प्रेम सो सौभाग्य सो नर पाइ है।।
संसार की सुख सम्पदा सब भांति सो नर पाइ है। गहु शरण जाहिल करि कृपा भगवान तोहि अपनाई है।।
प्रभुदित ह्रदय से जो सदा गुणगान प्रभु की गाइ है। संसार सागर से अवति सो नर सुपध को पाइ है।।
हे विश्वकर्मा विश्व के भगवान सर्वा धारणम्। शरणागतम्। शरणागतम्। शरणागतम्। शरणागतम्।।
श्री विश्वकर्मा भगवान की मुरति अजब विशाल। भरि निज नैन विलोकिये तजि नाना जंजाल।।
आरती गाऊं जगदीश हरी को। विश्वकर्मा स्वामी परम श्री की।
तन मन धन सब अर्पण तेरे। करो वास हिये में प्रभु मेरे।
शिव विरंची तुमरे गुण गावें। घनश्याम राम सिया मां ध्यावें। 1।
कलियुग में कर साधन कीन्हां। चतुरानन वेद पढयो मुनि चारा।
शिल्प कला शुभ मार्ग दीन्हा। साम यजु ऋग शिल्प भडारा। 2।
विश्वकर्मा नाम सदा अविनाशी। अगम अगोचर घट घट वासी।
कल्पतरु पद सब सुख धामा। सत्य सनातन मुद मगंल नामा। 3।
करें अर्चन सुमरण पूजा किसकी। नहीं तुम बिन दूजा करे आसा जिसकी।
विषय विकार मिटाओ मन के। दुख व्याधा रोग कटें तब तन के। 4।
माता पिता तुम शरणा गत स्वामी। तुम पूरण प्रभु नित्य अन्तर्यामी।
हम पावन पाठ करेंहिं चितलाई। करो संकट नाश सदा सुख दाई। 5।
परम विज्ञानी सत्य लोक निवासी। देव तनु धर आयो, ख राशी।
तुम बिन जग में कौन गोसाँई। विश्वप्रताप की अब जो करे सहाई। 6।

श्री विश्वकर्मा प्रार्थना

हे विश्वकर्मा ! परम प्रभु !, इतनी विनय सुन लीजिये। दु:ख दुर्गुणो को दूर कर, सुख सद् गुणों को दीजिये।।
ऐसी दया हो आप की, सब जन सुखी सम्पन्न हों। कल्याण कारी गुण सभी में, नित नये उत्पन्न हों।।
प्रभु विघ्न आये पास ना, ऐसी कृपा हो आपकी। निशिदिन सदा निर्मय रहें, सतांप हो नहि ताप की।।
कल्याण होये विश्व का, अस ज्ञान हमको दीजिये। निशि दिन रहें कर्त्तव्य रल, अस शक्ति हमनें कीजियें।।
तुम भक्त – वत्सल ईश हो, `भौवन` तुम्हारा नाम है। सत कोटि कोट्न अहर्निशि, सुचि मन सहित प्रणाम है।।
हो निर्विकार तथा पितुम हो भक्त वत्सल सर्वथा, हो तुम निरिहत तथा पी उदभुत सृष्टी रचते हो सढा।
आकार हीन तथा पितुम साकार सन्तत सिध्द हो, सर्वेश होकर भी सदातुम प्रेम वस प्रसिध्द हो।
करता तुही भरता तुही हरता तुही हो शृष्टि के, हे ईश बहुत उपकार तुम ने सर्लदा हम पर किये।
उपकार प्रति उपकार मे क्या दें तुम्हे इसके लिए, है क्या हमारा शृष्टि में जो दे तुम्हे इसके लिए।
जय दीन बन्धु सोक सिधी दैव दैव दया निधे, चारो पदार्थ दया निधे फल है तुम्हारे दृष्टि के।

श्री विश्वकर्मा आरती

आरती पंच मुखी विश्वकर्मा की
आरती विश्वकर्मा अवतार की
आरती विश्वकर्मा हरि की
आरती विराट विश्वकर्मा भगवान की
ओ3म् जय पंचानन देवा, प्रभु जय पंचानन देवा। ब्रह्मा विष्णु शंकर आदि करते नित्य सेवा। 1।
भव मय त्राता जगत विधाता, मुक्ति फल दाता। स्वर्ण सिहासन मुकुट शीश चहूँ, सबके मन भाता। 2।
प्रभात पिता भवना (माता) विश्वकर्मा स्वामी। विज्ञान शिल्प पति जग मांहि, आयो अन्तर्यामी। 3।
त्रिशुल धनु शंकर को दीन्हा, विश्वकर्मा भवकर्ता। विष्णु महल रचायो तुमने, कृपा करो भर्ता। 4।
भान शशि नक्षत्र सारे, तुम से ज्योति पावें। दुर्गा इन्र्द देव मुनि जन, मन देखत हर्षावें। 5।
श्रेष्ठ कमण्डल कर चक्तपाणी तुम से त्रिशुल धारी। नाम तुम्हारा सयाराम और भजते कुँज बिहरी। 6।
नारद आदि शेष शारदा, नुत्य गावत गुण तेरे। अमृत घट की रक्षा कीन्ही, जब देवों ने टेरे। 7।
सिन्धु सेत बनाय राम की पल में करी सहाई। सप्त ऋषि दुख मोचन कीन्हीं, तब शान्ति पाई। 8। (तब)
सुर नर किन्नर देव मुनि, गाथा नित्य गाते। परम पवित्र नाम सुमर नर, सुख सम्पति पाते। 9।
पीत वसन हंस वाहन स्वानी, सबके मन भावे। सो प्राणी धन भाग पिता, चरण शरण जो आवे। 10।
पंचानन विश्वकर्मा की जो कोई आरती गावे। निश्वप्रताप, दुख छीजें सारा सुख सम्पत आवे। 11।

आरती विश्वकर्मा अवतार की

ओ3म् जय पंचानन स्वामी प्रभु पंचानन स्वामी। अजर अमर अविनाशी, नमो अन्तर्यामी।
चतुरानन संग सात ऋषि, शरण आपकी आये। अभय दान दे ऋषियन को, सार कष्ट मिटाये। 1।
निगम गम पथ दाता हमें शरण पडे तेरी। विषय विकार मिटाओ सारे, मत लाओ देरी। 2।
कुण्डल कर्ण गले मे माला इस वाहन सोहे। जति सति संन्यासी जग के, देख ही मोहे। 3।
श्रेष्ठ कमण्डल मुकमट शीश पर तुम त्रिशूल धारी। भाल विशा सुलोचन देखत सुख पावँ नरनारी। 4।
देख देख कर रूप मुनिजन, मन ही मन रीझै। अग्नि वायु आदित्य अंगिरा, आनन्द रस पीजै। 5।
ऋषि अंगिरा कियो धारे तपस्या, शान्ति नही पाई। चरण कमल का दियो आसय, तब सब बन आई। 6।
भक्त की जय कार तुम्हारी विज्ञान शिल्प दाता। जिस पर हो तेरी दया दृष्टि भव सागर तर जाता। 7।
ऋषि सिर्फ ज्ञान विधायक जो शरण तुम्हारी आये। विश्वप्रताप दुख रोग मिटे, सुख सम्पत पावे। 8।


ओ3म् जय विश्वकर्मा हरे जय विश्वकर्मा हरे। दीना नाथ शरण गत वत्सलभव उध्दार करे। 1।
भक्त जनों के समय समय पर दुख संकट हर्ता। विश्वरुप जगत के स्वामी तुम आदि कर्ता। 2।
ब्रह्म वशं मे अवतार धरो, निज इच्छा कर स्वामी। प्रभात पिता महतारी भूवना योग सुता नामी। 3।
शिवो मनुमय त्वष्टा शिल्पी दैवज सुख दाता। शिल्प कला मे पांच तनय, भये ब्रह्म ज्ञाता। 4।
नारद इन्द्रशेष शारदा तव चरणन के तेरे। अग्नि वायु आदित्य अंगिरा, गावें गुण तेरे। 5।
देव मुनि जन ऋषि महात्मा चरण शरण आये। राम सीया और उमा भवानी कर दर्शन हर्षाये। 6।
ब्रह्मा विष्णु शंकर स्वमी, करते नित्य सेवा। जगत प्राणी दर्श करन हित, आस करें देवा। 7।
हेली नाम विप्र ने मन से तुम्हारा गुण गाया। मिला षिल्प वरदान विप्र को, भक्ति फल पाया। 8।
अमृत घट की रक्षा कीन्ही, सुर भय हीन भये। महा यज्ञ हेतु इन्द्र के घर, बन के गुरु गये। 9।
पीत वसन कर चक्र सोहे. महा वज्र धारी। वेद ज्ञान की बहे सरिता, सब विध सुखकारी। 10।
हम अज्ञान भक्त तेरे तुम सच्चे हितकारी। करो कामना सब की पूर्ण, दर पर खडे भिकारी। 11।
विश्वकर्मा सत्गुरु हमारे, कष्ट हरो तन का। विश्वप्रताप शरण सुख राशि दुख विनेश मन का। 12।